सजा से सदमे में पाकिस्तान की सेना, अब परवेज मुशर्रफ के समक्ष विकल्प क्या हैं?

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पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक 76 वर्षीय जनरल परवेज मुशर्रफ फिलहाल दुबई के एक अस्पताल में अपना इलाज करा रहे हैं, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में इस्लामाबाद की एक विशेष अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई है। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद छह के तहत अदालत ने मुशर्रफ को देश में आपातकाल लगाने के लिए दोषी पाया, जो नवंबर 2007 में वहां लगाई गई थी।

दरअसल पाकिस्तान के 72 वर्ष के वजूद में लगभग आधे समय तक सेना ने शासन किया है जिसमें तीन अन्य जनरलों- अयूब खान, याह्या खान (जिन्होंने अयूब खान से कमान संभाली) और जिया-उल-हक ने भी जबरन सत्ता पर कब्जा किया और संविधान का उल्लंघन किया। लेकिन इनमें से किसी को भी ट्रायल का सामना नहीं करना पड़ा। लिहाजा मुशर्रफ पहले सैन्य शासक हैं जिन पर मुकदमा चलाया गया और देशद्रोह का दोषी पाया गया

टॉप सैन्य लीडरशिप सकते में

लेकिन इस फैसले पर सेना ने गुस्सैल प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि कानूनी प्रक्रिया को अनदेखा किया गया है। सेना की इस प्रतिक्रिया से यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है कि मुशर्रफ फांसी के फंदे पर लटकने से बच जाएंगे और उन्हें दुबई से पाकिस्तान लाने के लिए विशेष प्रयास नहीं किया जाएगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मुशर्रफ से सेना का विशेष लगाव है। हां, यह संभव है कि उनके कुछ चाहने वाले अब भी सेना में मौजूद हों। दरअसल, इस प्रतिक्रिया को सेना बनाम सिविलियन की दृष्टि से देखना गलत न होगा। सेना किसी भी सूरत में प्रशासनिक कार्यों में अपने दखल पर विराम लगा देखना नहीं चाहती, वह चाहे अदालत के जरिये ही क्यों न हो।

सेना की मीडिया सेल इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस ने निर्णय पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि पाकिस्तान सशस्त्र बलों की रैंक एंड फाइल ने विशेष अदालत के फैसले को दु:ख व गुस्से के साथ सुना है। जबकि सेना प्रवक्ता आसिफ गफूर ने कहा, ‘एक पूर्व सेना प्रमुख, ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी का चेयरमैन व पाकिस्तान का राष्ट्रपति, जिसने देश की 40 वर्ष से अधिक सेवा की हो, देश की रक्षा के लिए युद्ध लड़े हों, वह निश्चित रूप से गद्दार नहीं हो सकता।’

पाकिस्तान का सिविल राजनीतिक तंत्र चाहता है कि सेना सिर्फ सीमा पर या बैरकों में रहे, और देश के प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप न करे। नवंबर 2007 में आपातकाल घोषित होने पर पाकिस्तान की जनता ने इसके विरुद्ध आंदोलन किया था। मुशर्रफ द्वारा पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को ‘बर्खास्त’ किए जाने पर वकील भी सड़कों पर उतर आए थे।

‘प्रॉक्सी शासन’ को अपनाया 

इन सबके कारण जहां पाकिस्तान में जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें लौटीं, जो उसके इतिहास में पहली बार अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने में भी सक्षम रहीं, वहीं सेना को भी एहसास हो गया कि वह ‘तख्ता पलट से राज’ नहीं कर सकती। इसलिए उसने रणनीति बदलते हुए ‘प्रॉक्सी शासन’ को अपनाया और जनता से अपने ही नुमाइंदे (इमरान खान) का ‘चुनाव’ करवा लिया। अब सेना को डर है कि कहीं ‘प्रॉक्सी शासन’ व्यवस्था भी उसके हाथ से न निकल जाए, इसलिए उसे यह दिखाने की जरूरत है कि हुक्मरानी अभी उसी की चल रही है। इसीलिए वह मुशर्रफ को बचाकर स्वयं को बचाने का प्रयास कर रही है। वह ऐसा मार्ग नहीं खुलने नहीं देना चाहती जो बाद में उसके लिए ही परेशानी का कारण बन जाए।

पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद छह के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति बल प्रयोग या किसी अन्य असंवैधानिक तरीके से संविधान को रद करता है या उलट-पलट करता है या स्थगित करता है या प्रसुप्तावस्था में रखता है या ऐसा करने की साजिश करता है तो वह उच्च राजद्रोह का दोषी होगा। उच्च राजद्रोह के लिए ‘उच्च राजद्रोह (सजा) कानून, 1993, के तहत सजा मौत या आजीवन कारावास है।

सेना के लिए मुशर्रफ को फांसी से बचाना आवश्यक

पाक में कोई ऐसा सैन्य शासक नहीं हुआ जिसने अनुच्छेद छह को ताक पर न रखा हो और इस बात की भी गारंटी नहीं है कि भविष्य में कोई अन्य सैन्य शासक ऐसा नहीं करेगा। इसलिए भी सेना के लिए मुशर्रफ को फांसी से बचाना आवश्यक हो जाता है। मुशर्रफ के संदर्भ में फैसला 2-1 के बहुमत से किया गया। विशेष अदालत की खंडपीठ के प्रमुख थे पेशावर हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वकार अहमद सेठ और दो अन्य सदस्य थे सिंध हाई कोर्ट के न्यायाधीश नजर अकबर व लाहौर हाई कोर्ट के न्यायाधीश शाहिद करीम। न्यायाधीश अकबर निर्णय से असहमत थे।

अब मुशर्रफ के समक्ष विकल्प क्या हैं?

वह दुबई से शायद इंग्लैंड चले जाएं, जहां से उन्हें वापस लाना कठिन हो जाए, खासकर इसलिए कि उन्हें वापस लाने या फांसी देने में सेना की कोई दिलचस्पी नजर नहीं आ रही है। दूसरा यह कि 30 दिनों के भीतर वह सुप्रीम कोर्ट में अपील करें, जिसके लिए उन्हें स्वयं अदालत में हाजिर होना पड़ेगा, जाहिर है वह ऐसा सेना से सुरक्षा की गारंटी मिलने पर ही करेंगे। अगर सुप्रीम कोर्ट मुशर्रफ की अपील को ठुकरा देता है तो वह क्षमा के लिए राष्ट्रपति से अपील कर सकते हैं। मुशर्रफ ने अभी खुद कुछ नहीं कहा है कि वह क्या करेंगे, शायद विस्तृत निर्णय आने के बाद वह अपनी योजना तैयार करें।

हालांकि दिसंबर 2007 में आपातकाल हटाने के बाद मुशर्रफ ने अपनी सुरक्षा के लिए कुछ विधेयक पारित कराए थे, लेकिन नवाज शरीफ की सरकार ने दिसंबर 2013 में उनके खिलाफ अदालत में मामला दर्ज कराया और मार्च 2014 में जब वह अदालत में मौजूद थे तो उन पर आरोप लगाए गए, जिनके बारे में उन्होंने कहा था कि वह दोषी नहीं हैं। वर्ष 2016 में वह पाकिस्तान छोड़ गए कुछ सप्ताह बाद लौटने का वायदा करते हुए, पर वह लौटे नहीं, शायद लौटेंगे भी नहीं।

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