हेर -फेर 19/20 का, इस साल ठनी रही चांद से

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विज्ञान जगत में भारत ने इस साल कई रहस्यों से पर्दा हटाया। साल के दूसरे हिस्से में तो हमारी चांद से ऐसी ठनी कि साल के अंत तक प्रतिद्वंद्वता चलती रही। चांद के अनछुए हिस्से में उतरकर एक लम्बी छलांग लगाते समय भले ही हमारे चंद्रयान-2 का विक्रम (लैंडर) बेताल की तरह गायब हुआ मगर उसे साल के अंत में हमारे ही एक इंजीनियर ने ढूंढ निकाला। इस साल हमारे वैज्ञानिकों ने भारतीयों के दिमाग का एटलस बना कर दुनिया को यह दिखा दिया कि भले ही हमारा दिमाग आकार में पूर्व और पश्चिम वालों से कुछ छोटा है मगर इससे हमारे अल्बर्ट आइंस्टीन हो जाने की संभावना और बढ़ जाती है। अंतरिक्ष जगत में इस साल हमारा दबदबा खूब बढ़ा। इसरो को लोहा दुनिया ने माना। दुनिया के अन्य देश अपने सेटलाइट प्रक्षेपण के लिए नासा और रॉस्कोमॉस को छोड़कर इसरो पर विश्वास कर रहे हैं। 2019 में इसरो ने अपने ही नहीं अन्य देशों के अनेक सेटलाइट अंतरिक्ष में सफलता पूर्वक स्थापित किए । हमारे विज्ञानिकों ने दिखाया कि वह गीले कपड़ों से भी बिजली पैदा कर सकते हैं। कुल मिलाकर इस साल विज्ञान का डंका तो खूब बजा…

इस साल इन तीनों की खूब रही चर्चा 
ऑर्बिटर: जब ऐन मौके पर विक्रम और प्रज्ञान चांद पर चकमा खाकर गायब हो गए तो इसरो के चंद्र मिशन की पूरी जिम्मेवारी ऑर्बिटर ने अपने कंधों पर उठाई। भूमिगत जल और चांद पर मौजूद तत्वों के बारे में ऑर्बिटर ने कई रहस्यों से पर्दा उठाया। ऑर्बिटर सात साल तक चांद की कक्षा में चक्कर लगाते हुए इसरो को जानकारियां भेजेगा।

प्रज्ञान: प्रज्ञान का नाम भी इस साल खूब जुबान पर चढ़ा। जुलाई के बाद पैदा हुई कई बच्चों के नाम तक इसके नाम पर रख दिए गए। यह चंद्रयान-2 का छह पहियों वाला रोवोर था। उसका नाम बुद्धि से लिया गया है। चांद की सतह पर उतर कर उसे अपनी बुद्धि का खेल दिखाना था और भारतीय बुद्धि का लौहा मनवाना था मगर ऐसा हो नहीं पाया। इसे लेकर चांद पर उतर रहा लैंडर विक्रम ही क्रेश कर गया।

विक्रम: चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का नाम मीडिया में खूब छाया। इसे नाम तो मिला था भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के जनक विक्रम साराभाई से मगर इसने अपना नाम भी खूब कमाया। चांद की सतह पर उतरते समय चकमा खा गया। फिर साल का बाकि हिस्सा इससे संपर्क जोडऩे और इसकी तलाश में गुजर गया। नासा का दावा है कि उसने चांद की सतह पर इसके 20 से ज्यादा टुकड़े देख लिए हैं।

भारतीय दिमाग 
आईआईटी हैदराबाद के ब्रेन एनाटोमी विभाग के शोधकर्ताओं ने दुनिया का पहला भारतीय ब्रेन एटलस तैयार किया। इसके अनुसार भारतीय उपमाहद्वीप के लोगों के दिमाग का आकार पश्चिमी और पूर्वी देशों के लोगों के दिमाग के आकार की तुलना में ऊंचाई, चौड़ाई और आयतन में कम होता है।

चंद्रयान-2
22 जुलाई को चंद्रयान-2 की सफल लांचिंग भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) की एक बड़ी छलांग थी। पूरी तैयारी तो चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग की थी मगर आखिरी समय में यह हार्ड हो गई। पूरे मिशन के तीन हिस्से थे। इनमें ऑर्बिटर को चांद की कक्षा में रह कर चांद की संरचना और निर्माण की जानकारियां जुटानी थीं। लैंडर विक्रम को चांद की सतह पर लैंड करना था और इसमें मौजूद रोवोर प्रज्ञान को चांद की सतह पर घूम कर प्रयोग करने थे। 2 सितम्बर को लैंडर विक्रम सफलतापूर्वक ऑर्बिटर से अलग हुआ। 7 सितम्बर को सॉफ्ट लैंडिग करते समय चांद की सतह से मात्र 200 मीटर की ऊंचाई पर विक्रम क्रेश हो गया। भारत भले ही सॉफ्ट लैंडिग में असफल रहा मगर यह मिशन 90 फीसदी से ज्यादा कामयाब रहा। अक्तूबर में ऑर्बिटर ने चांद की सतह का अध्ययन कर इसके दक्षिणी ध्रुव पर भूगर्भ में मौजूद बर्फ और चांद के निमार्ण के संबंध में और इस पर मौजूद तत्वों के बारे में कई नई जानकारियां दीं।

इन्होंने कुछ नया किया

शणमुग ने ढूंढा विक्रम: 3 दिसम्बर को नासा ने चांद की सतह पर चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का मलबा ढूंढ निकालने की घोषणा की। उसने इस खोज का श्रेय चेन्नई के मैकेनिकल इंजीनियर शणमुग सुब्रामण्यम को दिया। शणमुग ने करीब एक हफ्ते तक रोज छह से सात घंटे तक मेहनत की। उन्होंने नासा द्वारा सार्वजनिक किए गए डाटा को खंगाला और उसकी विक्रम के लैंडिंग के दिन से पहले की तस्वीरों से तुलना कर लैंडर के एक टुकड़े को खोज निकाला था। नासा ने उसका नाम शणमुग के नाम पर ‘एस’ रखा है।

ऋतु करिधाल: इसरो की वैज्ञानिक ऋतु करिधाल अब रॉकेट वुमन के नाम से जानी जाती हैं। मिशन मंगलयान की डिप्टी डायरेक्टर रहीं और चंद्रयान-2 की डायरेक्टर होने 2019 में उनके हिस्से काफी सुर्खियां आईं। महिला वैज्ञानिक के नेतृत्व में इसरो का पहला बड़ा मिशन इसी साल हुआ।

डॉ. के सिवन: डॉ. के सिवन इस साल खूब चर्चा में रहे। मिशन चंद्रयान-2 ने उन्हें इस साल का स्टार बनाया। जुलाई से दिसम्बर तक उनका मिशन लगातार चर्चा में रहा। सफलता, विफलता या आंशिक सफलता, इन सबसे ऊपर उठकर वह इस साल के हीरो बने। 7 सितम्बर को तड़के जब विक्रम सॉफ्ट लैंडिंग में विफल रहा तो सिवन की आंखों का भर आना तथा प्रधानमंत्री का उन्हें गले लगाना, एक ऐसा दृश्य था जो सीधे लोगों के दिल में उतर गया।

साल भर छाया रहा इसरो

25 जनवरी: पीएसएलवी-सी44 रॉकेट की मदद से इसरो ने सेटेलाइट माइक्रोसेट-आर और कलामसेट-वी2 को सफलतापूर्वक लांच किया।
01 अपैल: इसरो ने श्रीहरिकोटा केंद्र में अपनी सफलता की गाथा को आगे बढ़ाते हुए ईमीसेट और अन्य देशों के 28 सेटेलाइट एक साथ सफलतापूर्वक उनकी तय कक्षा में स्थापित किए।
22 मई: इसरो ने जासूसी उपग्रह आरआईसेट-2बी को सफलतापूर्वक उसकी कक्षा में स्थापित किया।
25 नवम्बर: इसरो ने नक्शा तैयार करने में सहायक उपग्रह कार्टोसेट-3 और अमरीकी कंपनियों के 13 कमर्शियल नैनो सेटेलाइट सफलतापूवर्क लांच किए।
11 दिसंबर : इसरो ने सिंथेटिक अपर्चर राडार (सार) युक्त अत्याधिक क्षमता वाला भारतीय जासूसी उपग्रह आरआईसेट-2बीआरआई लांच किया। यह दिन और रात ही नहीं घने बादलों में से भी धरती की तस्वीर ले सकता है।

चंपा और चमेली: 17 अक्तूबर को उड़ीसा के भुवनेश्वर में देश का पहला ऐसा रेस्त्रां खुला, जहां दो रोबोट खाना परोसते हैं। इन दोनों का नाम चम्पा और चमेली है। रोबो शेफ नामक इस रेस्त्रां में ये दोनो रोबोट क्या आप खुश हैं कहकर हर ग्राहक का स्वागत करते हैं।

मिशन शक्ति: 27  मार्च को डीआरडीओ और इसरो ने मिलकर भारत को अंतरिक्ष में एक नई ताकत बनाया। 300 किलोमीटर की ऊंचाई पर धरती की निचली कक्षा में मौजूद एक सेटेलाइट को अग्नि-5 से निशाना बनाया गया। इसके साथ ही भारत ए-सेट वैपन से लैस हो गया।

सबसे बड़ी चुनौती पराली के धुएं का तोड़: पछले कई वर्षों की तरह इस साल भी अक्तूबर-नवम्बर में पंजाब और हरियाणा के किसानों का पराली जलाना एक बड़ी समस्या बना रहा। हालांकि वैज्ञानिकों ने पराली से एथेनॉल बनाने का तरीका ढूंढ निकाला है मगर इस पर बड़े पैमाने पर अमल की जरूरत है।

बाबूजी यहां बिजली मिली: 4 नवम्बर को आईआईटी खडगपुर के मैकेनिकल विभाग ने गीले कपड़ों से बिजली बनाकर एक नई खोज की। एक रिस्पेटर से जोड़े गए इन गीले कपड़ों से प्रयोग के दौरान 10 वोल्ट बिजली पैदा की गई।

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