MOVIE REVIEW: ऐतिहासिक फिल्म में मसाला डालने की नई कोशिश है ‘तानाजी: द अनसंग वारियर’

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अक्सर कहानी के बैकग्राउंड को साफ़ करने के लिए मेकर्स एनिमेशन का यूज करते हैं। इस फिल्म में हमें दूसरी फिल्मों की तरह बोरिंग एनिमेशन का यूज देखने को नहीं मिलता। कहानी में सूबेदार तानाजी मालुसरे (अजय देवगन) देश की आजादी के अपने पिता के वादे को पूरा करते हैं। फिल्म में छत्रपति शिवाजी महाराज (शरद केलकर) को पूरे देश में स्वराज का सपना दिखाते दिखाया गया है।

उदयभान (सैफ अली खान) कोंधना पर कब्जा करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। विरोध के बावजूद, शिवाजी महाराज उदयभान का सामना करने के लिए अपने सबसे वफादार तानाजी को भेजने के लिए राजी हो जाते हैं। बाकी की कहानी में यह बताया गया है कि कैसे तानाजी अपने बुद्धि और बल के साथ कोंधना पहुंचते हैं और उदयभान का सामना करते हैं। प्रकाश कपाड़िया और ओम राउत की कहानी निश्चित रूप से कई लिबर्टी लेती है। कई जगह पर सीन्स को देखकर ऐसा लगता है कि “वास्तव में ऐसा हुआ है?” मेकर्स ने फिल्म को यूजुअल पीरियड ड्रामा से अलग हटकर बनाया है, जिन्हें हमने देखा है। यह फिल्म पीरियड ड्रामा और एक कमर्शियल फिल्म के बीच की कड़ी नजर आती है।

बहुत सारी थ्योरी और कम प्रैक्टिकल की वजह से फिल्म का फर्स्ट हाफ मिस हो जाता है। दूसरे हाफ में यह बहुत तेजी से बढ़ता है और आपको क्लाइमेक्स पर ले जाकर छोड़ देता है। धर्मेंद्र शर्मा की एडिटिंग की गति काफी तेज है। आजकल मेकर्स के लिए फिल्म की ड्यूरेशन (130 मिनट) एक बेंचमार्क है।

अजय देवगन अपने परफॉर्मेंस से सभी का दिल जीतने में कामयाब रहे हैं। उनमें तानाजी के कैरेक्टर के लिए जरुरी सभी एलिमेंट आपको देखने को मिलेंगे। उनके रहने से फिल्म में एक्साइटमेंट बना रहता है। सैफ अली खान का कैरेक्टर, एक ही समय में पागल भी है और प्यारा भी है। यह शानदार है कि उनका कैरेक्टर विलेन के रूप में होकर भी अपनी कॉमिक टाइमिंग से स्क्रीन को मैनेज कर लेता है। असल में उनका कैरेक्टर पुरानी शराब की तरह है, जितना अधिक आप उसे देखेंगे वह उतना ही बेहतर होगा। उन दोनों के बेस्ट होने के बावजूद, फिल्म में सबसे बड़ा टेक्रेड छत्रपति शिवाजी महाराज के रूप में शरद केलकर हैं। उन्होंने इस किरदार में गहरी छाप छोड़ी है। अगर अब से छत्रपति शिवाजी महाराज पर कुछ भी बनता है, तो उन्हें निभाने वाले एक्टर को शरद केलकर होना चाहिए। काजोल ने एक-दो सीन शेयर किए हैं और वह इनमे काफी अच्छी रही हैं।

अपनी पहली बॉलीवुड फिल्म को डायरेक्ट करने के बावजूद, ओम राउत इस पैमाने को बहुत अच्छी तरह से संभालते हैं। इससे पहले के पीरियड-ड्रामा ने जो किया है, वह बहुत फार्मूलाबद्ध नहीं है। यह फिल्म एक चुटकी मसाले के साथ इस जेनर को फिर से बनाने और पिघलाने का एक नया प्रयास है। उन्होंने फिल्म में बहुत ही रोचक इतिहास के बारे में बताया है, लेकिन अपने तरीके से।

सबसे पहले और सबसे जरुरी, क्रेडिट संदीप शिरोडकर का बैकग्राउंड स्कोर है जो आपको स्क्रीन पर चलने वाले सीन से कनेक्ट करने में मदद करता है। फिल्म के गाने इसकी कमजोर कड़ी हैं क्योंकि उनमें से ज्यादातर मजबूर लगते हैं। कुल मिलाकर तानाजी आपकी उम्मीदों पर खरी उतरने वाली फिल्म है।

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