बिहार चुनाव में जातिवाद से लेकर वंशवाद तक दिख रहे सभी तरह के रंग

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पटना। बिहार में चुनावी बयार तो कई महीने से चल रही है, लेकिन अब बात अलग है। चुनावी रंग चटक होने लगा है, जिस कारण पुराने समीकरण ध्वस्त हो गए हैं और नए गढ़े जाने लगे हैं। चौराहों-चौपालों में अब तक छाई चुप्पी, थोड़ा-थोड़ा बतियाने लगी है, लेकिन उसे पूरी तरह खुलना अभी बाकी है। नेताओं के उड़नखटोले गांव-गिरांव में उतरने से माहौल जरूर बनता सा नजर आने लगा है। शांत जनता बातें सुन रही है और मन ही मन आकलन कर रही है। मुखर हैं तो पार्टियां, जिनके पास अपनी जीत के तमाम तर्क हैं। कहा जा सकता है कि चुनाव काल का वह मध्य भाग आ चुका है, जिसमें दलों की भूमिका अपने वादों को परोसने की होती है और जनता की उसे सुनने की। यह पक्ष अब हर तरफ दिख रहा है।

चुनाव में जातिवाद का मुलम्मा चढ़ चुका है। वंशवाद ने पांव पसार लिए हैं। दागी-बेदागी बेमानी है। दल-बदल के कोई मायने नहीं। चूंकि इन पर बहस जरूरी है, इसलिए बहस भी जारी है। सभी इस (अब बन गई) परंपरा का निर्वहन बखूबी कर भी रहे हैं। इसलिए अब लगने लगा है कि चुनाव है। बेरोजगारी की बात उठी, बस उठ कर रह गई। शिक्षा की बात उठी, दब गई। भ्रष्टाचार थोड़ा चला, फिर ठिठक गया। पांच साल ये सब मुद्दे खूब चले, लेकिन अब चुनाव है तो थोड़े शांत हो चले हैं। इन पर चुनाव के समय के मुद्दों का शोर हावी हो रहा है। लगभग 15 साल इनका शासन कैसा और 15 साल उनका शासन ऐसा। ये कह रहे कि वो आ गए तो कश्मीर के आतंकी बिहार आ जाएंगे, वो कह रहे कि सांप्रदायिकता का सहारा न लें। नवरात्र आज से शुरू है और आगे दशहरा है, राममंदिर बन रहा है। इसे लोग जानते हैं, लेकिन यह भी बताने की कोशिश शुरू हो गई है। वोट पड़ते-पड़ते बातें कहां तक पहुंचेंगी, फिलहाल यह बताना मुश्किल है

साथ पकड़ने-छोड़ने का दौर पहले ही समाप्त हो चुका है। जैसे-तैसे सीटें भी बंट गईं हैं। जैसे-तैसे इसलिए कि किसी को उतार कर दूसरों को बैठाने और जिताऊ लाने के लिए अपनों को हटाने में मशक्कत करनी पड़ी। सभी इससे जूझे और बगावती सुर थामने के लिए निष्काषित करने लगे। अभी यह निष्कासन जारी है। भाजपा 12 नेताओं को निकाल चुकी है तो जदयू 15 नेताओं को। अब यह अलग बात है कि जिसने दूसरे की सदस्यता ले ली और सिंबल थाम लिया तो उसको फर्क क्या पड़ा? बहरहाल, परंपरा है तो निर्वहन भी जरूरी है। जिन्हें लगा, वो कर रहे हैं और जिन्हें नहीं लगा, उन्होंने तवज्जो नहीं दी। बड़ी सोच का बोलबाला है। मुख्यमंत्री पद के लिए ही नीतीश और तेजस्वी के अलावा चार और दावेदार हैं। एनडीए से अलग थलग हो चुके चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी की तरफ से दावेदार हैं तो कुछ पार्टयिों को मिलाकर प्रोग्रेसिव डेवलपमेंट एलाइंस (पीडीए) बनाने वाले पप्पू यादव का नाम भी उनके गठबंधन ने चला दिया है। असुदद्दीन ओवैसी, बहुजन समाज पार्टी आदि से गठबंधन कर ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट (जीडीएसएफ) बनाने वाले राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा और कुछ महीने पहले अचानक बिहार आकर नीतीश सरकार पर प्रहार करने वाली पुष्पम प्रिया अपनी प्लूरल्स पार्टी की तरफ से चेहरा हैं।

तीसरे और आखिरी चरण का नामांकन खत्म होने में अब महज तीन दिन बचे हैं। इसलिए चुनावी जोश अब जागने लगा है, इस तरह जागने लगा है कि कोरोना डर कर भाग गया है। पुराने तरीके से मैदानों पर भीड़ जुटने लगी है और भाषण शुरू हो गए हैं। शारीरिक दूरी सिर्फ घोषणा भर तक सीमित है। इसमें नेताओं का दोष नहीं है। बात रूबरू होकर समझने के धनी पहले ही उतावले बैठे थे। वर्चुअल में वो बात नहीं थी, इसलिए जैसे ही एक्चुअल की अनुमति मिली तो पहली रैली भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की हुई। उस पहली ही रैली में मानक धरे रह गए और कंधे छिल गए। जांच के बाद चुनाव आयोग ने केस दर्ज कर लिया। अब यही हाल सभी राजनीतिक रैलियों में है। मास्क हो न हो, भीड़ आत्मीय तरीके से जुड़ रही है। चुनाव आयोग लगातार सचेत कर रहा है, प्रशासन भरपूर प्रयास कर रहा है, लेकिन लोग मानते नहीं दिख रहे। इसे देख लगने लगा है कि कोरोना के कारण मतदान का प्रतिशत अब प्रभावित होने वाला नहीं। आगे-आगे देखिए, होता है क्या?